વિનોદ વિહાર

ગુજરાતી ગદ્ય-પદ્ય સર્જનની આનંદ યાત્રા

Daily Archives: મે 20, 2018

1200 – સૌ સીનીયરોએ અપનાવવા જેવી એક વૃદ્ધની સલાહ ..એક પ્રેરક સત્ય ઘટના.

મારા લોસ એન્જેલસમાં રહેતા મિત્ર શ્રી વલ્લભભાઈ ભક્તાએ એમના આજના વોટ્સેપ સંદેશમાં હિન્દીમાં એક પ્રેરક સત્ય ઘટનાત્મક વાર્તા મને વાંચવા મોકલી છે.

મને એ ખુબ ગમી ગઈ.એમના આભાર સાથે વિનોદ વિહારના વાચકોને માટે આજની પોસ્ટમાં શેર કરું છું.

આ સત્ય કથાનો મધ્યવર્તી વિચાર એ છે કે વૃદ્ધાવસ્થામાં બીજાની મદદ પર બહુ આધાર રાખવાની ટેવ ત્યજી બને એટલું પોતાનું કામ જાતે કરી લેવાની ટેવ પાડવી હિતાવહ છે.

નીચે હિન્દીમાં પ્રસ્તુત આ સત્ય ઘટના વાંચીને સૌ સીનીયર ભાઈ-બહેનોએ આ વાર્તાના વૃદ્ધ સજ્જનની આ શિખામણ એમના જીવનમાં ઉતારવા જેવી છે.

“जब तक हो सके,
आत्मनिर्भर रहो।”
अपना काम,
जहाँ तक संभव हो,
स्वयम् ही करो।”

વિનોદ પટેલ

અપના હાથ, જગન્નાથ …! ….. (સત્ય ઘટના)

कल दिल्ली से गोवा की उड़ान में एक सज्जन मिले।
साथ में उनकी पत्नि भी थीं।

सज्जन की उम्र करीब 80 साल रही होगी। मैंने पूछा नहीं लेकिन उनकी पत्नी भी 75 पार ही रही होंगी।

उम्र के सहज प्रभाव को छोड़ दें, तो दोनों करीब करीब फिट थे।

पत्नी खिड़की की ओर बैठी थींसज्जन बीच में और
मै सबसे किनारे वाली सीट पर थी।

उड़ान भरने के साथ ही पत्नी ने कुछ खाने का सामान निकाला और पति की ओर किया। पति कांपते हाथों से धीरे-धीरे खाने लगे।

फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व होना शुरू हुआ तो उन लोगों ने राजमा-चावल का ऑर्डर किया।

दोनों बहुत आराम से राजमा-चावल खाते रहे। मैंने पता नहीं क्यों पास्ता ऑर्डर कर दिया था। खैर, मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि मैं जो ऑर्डर करती हूं, मुझे लगता है कि सामने वाले ने मुझसे बेहतर ऑर्डर किया है।

अब बारी थी कोल्ड ड्रिंक की।

पीने में मैंने कोक का ऑर्डर दिया था।

अपने कैन के ढक्कन को मैंने खोला और धीरे-धीरे पीने लगा।

उन सज्जन ने कोई जूस लिया था।

खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल के ढक्कन को खोलना शुरू किया तो ढक्कन खुले ही नहीं।

सज्जन कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे।
मैं लगातार उनकी ओर देख रही थी। मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें मुश्किल आ रही है तो मैंने शिष्टाचार हेतु कहा कि लाइए…” मैं खोल देती हूं।”

सज्जन ने मेरी ओर देखा, फिर मुस्कुराते हुए कहने लगे कि…

“बेटा ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा।

मैंने कुछ पूछा नहीं,लेकिन वाल भरी निगाहों से उनकी ओर देखा।

यह देख, सज्जन ने आगे कहा

बेटाजी, आज तो आप खोल देंगे।

लेकिन अगली बार..? कौन खोलेगा.?

इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए।

पत्नी भी पति की ओर देख रही थीं।

जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था।

पर पति लगे रहे और बहुत बार कोशिश कर के उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया।

दोनों आराम से जूस पी रहे थे।

मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में
ज़िंदगी का एक सबक मिला।

सज्जन ने मुझे बताया कि उन्होंने..ये नियम बना रखा है,

कि अपना हर काम वो खुद करेंगे।

घर में बच्चे हैं,
भरा पूरा परिवार है।

सब साथ ही रहते हैं। पर अपनी रोज़ की ज़रूरत के लिये
वे सिर्फ पत्नी की मदद ही लेते हैं, बाकी किसी की नहीं।

वो दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं

सज्जन ने मुझसे कहा कि जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए।

एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो समझो बेटा कि बिस्तर पर ही पड़ जाऊंगा।

फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं,
वो काम उससे।

फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा।

अभी चलने में पांव कांपते हैं, खाने में भी हाथ कांपते हैं, पर जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए।

हम गोवा जा रहे हैं,दो दिन वहीं रहेंगे।

हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं।

बेटे-बहू कहते हैं कि अकेले मुश्किल होगी,

पर उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी
जब हम घूमना-फिरना बंद करके खुद को घर में कैद कर लेंगे।

पूरी ज़िंदगी खूब काम किया। अब सब बेटों को दे कर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं।

और हम दोनों उसी में आराम से घूमते हैं।

जहां जाना होता है एजेंट टिकट बुक करा देते हैं। घर पर टैक्सी आ जाती है। वापिसी में एयरपोर्ट पर भी टैक्सी ही आ जाती है।

होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है।

स्वास्थ्य, उम्रनुसार, एकदम ठीक है।

कभी-कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती।पर थोड़ा दम लगाओ,

मेरी तो आखेँ ही खुल की खुली रह गई।

मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगी।

पर यहां तो मैंने जीवन की फिल्म ही देख ली।

एक वो फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था।

“जब तक हो सके,
आत्मनिर्भर रहो।”
अपना काम,
जहाँ तक संभव हो,
स्वयम् ही करो।

सत्य है शिव है सुंदर है

લેખક- અજ્ઞાત

न कजरे की धार न मोतियों के हार फिर भी कितनी सुन्दर हो।

One Old Age Poem

Now I Lay Me Down to Sleep

If the mattress is hard, but not excessively hard,
If the comforter is not too heavy or light,
If the bottom sheet has been tucked in real tight,
If the temperature in the room isn’t hot or freezing,
If the neighbour’s cat isn’t mating in the front yard,
If the neighbour’s kid isn’t playing his acoustic guitar,
If the car alarm doesn’t go off in the neighbour’s car,
If my husband is not grinding his teeth or wheezing,
If the blackout curtains are keeping the room dim,
If I don’t get a cramp or a sinus attack,
If I manage to push my ten thousand anxieties back,
If I don’t think I hear a burglar quietly creeping,
If two – thirds of the bed is not occupied by him,
If at four in the morning the telephone doesn’t ring,
If the paper is delivered gently and no birds sing,
I might actually – I just might – do a little sleeping..

— Mrs. Meena Murdeshwar …From e-mail